किसी भी मिडिल-क्लास परिवार के लिए घर खरीदना जीवन का सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील वित्तीय निर्णय माना जाता है। इसी मुद्दे पर TaxBuddy के फाउंडर सुजीत बांगर ने हाल ही में एक विस्तृत पोस्ट साझा की है। इस पोस्ट में उन्होंने स्पष्ट रूप से समझाया है कि घर खरीदने वाले किस तरह अनावश्यक खर्चों से बच सकते हैं और किस प्रकार अधिक सूझबूझ के साथ होम लोन से जुड़े फैसले ले सकते हैं।
बांगर का कहना है कि कई बार खरीदारों को लोन प्रक्रिया के आख़िरी चरण में ऐसे चार्ज का सामना करना पड़ता है जिनकी जानकारी शुरुआत में बिल्कुल नहीं दी जाती। इसलिए जागरूकता ही वह साधन है, जो लाखों रुपये और लंबे समय का तनाव बचा सकता है।
1. लोन सैंक्शन के बाद सामने आने वाले छिपे चार्ज
सुजीत बांगर बताते हैं कि अधिकांश बैंक शुरुआत में सभी खर्चों को स्पष्ट रूप से डिस्क्लोज नहीं करते।
लोन सैंक्शन होने के बाद खरीदार पर कई अतिरिक्त चार्ज सामने आते हैं, जैसे—
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प्रोसेसिंग फीस
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टेक्निकल चार्ज
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लीगल चार्ज
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वैल्यूएशन चार्ज
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डॉक्यूमेंटेशन चार्ज
वे सलाह देते हैं कि हर ग्राहक को बैंक से “कॉस्ट ब्रेकअप शीट” अनिवार्य रूप से मांगनी चाहिए।
अगर बैंक ऐसा देने में हिचकिचाता है तो RBI के सर्कुलर के अनुसार यह जानकारी देना उनकी जिम्मेदारी है—ग्राहक इस संदर्भ में बैंक से स्पष्ट स्पष्टीकरण मांग सकते हैं।
2. महंगे “अनिवार्य इंश्योरेंस” का दबाव – सच क्या है?
बांगर का कहना है कि लोन प्रक्रिया के दौरान अक्सर ग्राहकों को बताया जाता है कि लोन मिलने से पहले एक महंगी इंश्योरेंस पॉलिसी लेना “ज़रूरी” है।
वे स्पष्ट करते हैं कि होम लोन पर 4% तक का इंश्योरेंस प्रीमियम अनिवार्य नहीं होता।
अक्सर रिलेशनशिप मैनेजर (RM) रजिस्ट्री के कुछ दिन पहले इस प्रावधान का उल्लेख करते हैं, जब ग्राहक समय की कमी के कारण विकल्प तलाश नहीं पाता।
उनकी सलाह है कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए शुरुआत में ही दो से तीन बैंकों में साथ-साथ आवेदन करना बेहतर रणनीति है।
3. टैक्स में अधिक छूट पाने के लिए जॉइंट लोन एक स्मार्ट विकल्प
सुजीत बांगर बताते हैं कि जॉइंट होम लोन से टैक्स बेनिफिट्स दोगुने हो सकते हैं।
जॉइंट बॉरोअर्स (जैसे पति-पत्नी या माता-पिता-बच्चे) निम्नलिखित छूट ले सकते हैं—
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1.5 लाख रुपये तक (सेक्शन 80C) – प्रिंसिपल
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2 लाख रुपये तक (सेक्शन 24) – ब्याज
दोनों उधारकर्ता मिलकर लगभग 7 लाख रुपये तक की टैक्स छूट सालाना प्राप्त कर सकते हैं, जो होम लोन की कुल लागत को काफी हद तक कम करता है।
4. महिलाओं के नाम पर रजिस्ट्री – स्टाम्प ड्यूटी में बड़ी बचत
कई राज्यों—खासकर दिल्ली और हरियाणा—में महिलाओं के नाम पर प्रॉपर्टी रजिस्ट्री कराने पर स्टाम्प ड्यूटी कम लगती है।
बांगर का अनुमान है कि 1 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी पर लगभग 2 लाख रुपये तक की बचत संभव है।
हालांकि, वे यह भी सुझाव देते हैं कि ऐसा निर्णय लेते समय उत्तराधिकार से जुड़े कानूनी पहलुओं और भविष्य की जिम्मेदारियों को पूरी तरह समझ लेना आवश्यक है।
5. किसी भी पेमेंट से पहले RERA पोर्टल पर प्रोजेक्ट की अनिवार्य जांच
सुजीत बांगर सलाह देते हैं कि खरीदार किसी भी अग्रिम भुगतान या बुकिंग से पहले राज्य की RERA वेबसाइट पर प्रोजेक्ट की स्थिति और बिल्डर का रिकॉर्ड अवश्य जांचें।
RERA पर जांच करके निम्न खतरे पहले से पहचाने जा सकते हैं—
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प्रोजेक्ट के पेंडिंग अप्रूवल
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कानूनी विवाद
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निर्माण में देरी
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बिल्डर का पिछला रिकॉर्ड
वे कहते हैं कि RERA सर्च को अनदेखा करना उपभोक्ता को भविष्य की गंभीर समस्याओं में डाल सकता है।
निष्कर्ष: जागरूकता ही खरीदार को आर्थिक जोखिमों से बचाती है
सुजीत बांगर की पोस्ट में साझा सुझाव यह दर्शाते हैं कि होम लोन जटिल जरूर है, लेकिन सही जानकारी और समय पर लिए गए निर्णय खरीदार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
छिपे चार्ज, अनिवार्य इंश्योरेंस की जबरदस्ती, टैक्स बेनिफिट्स की अनदेखी, और RERA जांच को स्किप करना—ये सभी गलतियाँ लोन की कुल लागत पर बड़ा असर डालती हैं।
इसलिए, घर खरीदने वालों के लिए यह आवश्यक है कि वे प्रक्रिया की हर स्टेज पर पूरी पारदर्शिता और जांच सुनिश्चित करें, जिससे लाखों रुपये की बचत और मानसिक तनाव से राहत मिल सके।
Disclaimer: इस लेख में बताए गए विचार संबंधित विश्लेषक या संस्था के हैं। ये newsnavigatordaily.com के विचारों को प्रदर्शित नहीं करते। यह सामग्री केवल शिक्षण और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।

